हिमालय की गोद से निकली,
एक तेज़ उजली सी वाणी थी,
न भय था उसमें, न झिझक कोई,
बस सत्य की गहरी कहानी थी।
ना सुख की चाह, ना यश का लोभ,
ना सत्ता का कोई आकर्षण,
वह जाग्रत आत्मा था भारत की,
जिसका लक्ष्य था आत्म-जागरण।
“उठो, जागो” का मंत्र दिया,
सोई चेतना को स्वर मिला,
कमज़ोर समझे गए मनुष्यों को,
अपने भीतर ईश्वर दिखा।
मंदिर ढूँढे नहीं पत्थरों में,
आत्मा में ईश्वर को पहचाना,
सेवा को साधना बताया उसने,
दरिद्र नारायण को भगवान माना।
समुद्र लांघ कर विश्व को बताया,
भारत का प्राचीन ज्ञान,
जहाँ हर प्राणी में एक ही आत्मा,
जहाँ प्रेम है सबसे बड़ा सम्मान।
आज भी उसकी वाणी गूँजती है,
हर युवा के सपनों में कहीं,
विवेकानंद सिर्फ़ नाम नहीं,
वह शक्ति है—जो सोने नहीं दे कहीं।